Indian Youth

About Anything & Everything

8 Posts

39 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8514 postid : 27

मर्यादा-पुरुषोत्तम श्री राम की वकालत

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अभी कुछ दिनों से जंक्शन पर गाँधी जी को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है.मैं भी उस बहस का एक हिस्सा हूँ.किसी की कमियों को उसकी अच्छाइयों में छिपाने के लिए लोग अक्सर चाँद का उदहारण दिया करते हैं पर इस बार इसके लिए मर्यादा-पुरुषोत्तम श्री राम का नाम लिया गया है.सवाल उठाया गया है कि जैसे गाँधी जी कि कुछ गलतियों के लिए हम उन पर सवाल उठा रहे हैं वैसे तो भगवान राम ने भी सीता माता को गर्भवती होने के बावजूद अयोध्या से निकल दिया था तो इस तरह से तो हमें उन्हें भी आराध्य या आदर्श नहीं मानना चाहिए.जाहिर सी बात है की ये सवाल रामायण की पूरी जानकारी न होने की वजह से ही पूछा गया है.इस ब्लॉग में मैंने रामायण की ही कुछ बातों से उनके चरित्र की वकालत(जिसकी कोई जरुरत नहीं है पर सिर्फ जानकारी देने के लिए ) करने की कोशिश की है.अगर मुझसे कोई त्रुटी हो तो कृपया सुधारने के लिए अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें.
लंका से वापस आने पर अयोध्या में ये बात उठी थी कि राजा को एक पराये मर्द के घर रहकर आई स्त्री को अपने घर नहीं रखना चाहिए.ये बात कहने वाले को श्री राम दंड भी दे सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि ऐसा करना प्रजा के अधिकारों का हनन करना होता जो कि वो कदापि नहीं कर सकते थे.
एक पति होने के नाते वो सीता जी को महल में ही रख सकते थे पर वो सिर्फ एक पति ही नहीं एक आदर्श राजा भी थे और ये बात सीता जी भी जानती थी इसीलिए श्री राम से उन्होंने स्वयं कहा कि वो अपना फैसला एक पति कि हैसियत से नहीं बल्कि एक राजा कि हैसियत से दें.और इसके बाद श्री राम ने सीता जी को अयोध्या से निष्काषित कर दिया था.
सवाल किया जाता है कि श्री राम ने गर्भवती सीता को यूँ ही छोड़ दिया था उनके पास कोई सुरक्षा नहीं थी.श्री राम उन्हें उनके पिता के घर भी भेज सकते थे.
इसका जवाब ये है कि सीता जी ने श्री राम से एक बार गर्भावस्था के समय गंगा किनारे आश्रमों के दर्शन करने की इच्छा जाहिर की थी.और वनवास पर भेजते समय उन्होंने उनकी इसी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हुए लक्ष्मण जी से सीता जी को गंगा किनारे भेजा था जहाँ पर वो जानते थे कि कई ऋषियों( वाल्मीकि भी ) के आश्रम है और उनमे से किसी न किसी में उन्हें शरण मिल जाएगी और उनकी देखभाल भी हो जाएगी.और धरा की उस पुत्री को उसी धरा पर कही आसरा न मिले ऐसा तो संभव नहीं था.
सवाल किया जाता है कि जब सीता जी जंगलों में रह रही थी तब श्री राम महल में सुख-सुविधाओं से रह रहे थे.परन्तु ये सच नहीं है भौतिक सुविधाएं कई बार उतनी कीमत नहीं रखती जितनी कि समाज की बाकी चीजें रखती हैं.जैसे कि सीता जी जंगल में साधुओं के बीच सात्विक वातावरण में रह रही थी और उसके विपरीत श्री राम अयोध्या में उन लोगों के बीच रह रहे थे जिनकी वजह से श्री राम ने एक व्यक्ति के तौर पर अपनी भार्या खोयी थी.
अब बात आती है की वियोग किसने ज्यादा झेला.राम और सीता में कौन किससे ज्यादा प्रेम करता था इस बात का जवाब तो शायद उन दोनों के पास भी नहीं होगा.जितना वियोग राम को सीता से बिछड़ने का था उतना ही वियोग सीता को राम से बिछड़ने का था.पर कहते है कि एक परिवार माँ-बाप-बच्चों से बनता था.जहाँ श्री राम महल में अकेले थे वहीँ सीता जी के पास उनके दोनों बच्चे थे जो कि राम से बड़ा परिवार था.उस पर भी सीता जी को उनके बच्चो का प्रेम प्राप्त था परन्तु श्री राम को अपने ही बच्चों की नाराजगी का पात्र बनाना पड़ा था जो कि तब दूर हुई थी जब स्वयं श्री राम ने लव-कुश से कहा था कि वो फैसला एक राजा का फैसला था और राज-धरम के लिए अगर व्यक्ति को अपनी जान भी देनी पड़े तो उसे पीछे नहीं हटाना चाहिए तभी वो राजा कहलाने के लायक होगा.और इसके बाद लव-कुश ने उनसे क्षमा भी मांग ली थी और कहा था कि ये गलती उनकी नहीं ये अयोध्या कि गलती थी.जो मेरे ख्याल से सही भी था क्योंकि जब राजा की जीत होती है तो उसे राज्य कि जीत कहा जाता है और जब हार होती है तो उसे राज्य की हार मानना चाहिए.
श्री रामचन्द्र ने एक भगवान का नहीं एक इंसान का ही जीवन व्यतीत किया था और राजधरम को व्यक्तिगत धर्म से ऊपर रखा इसीलिए उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा जाता है.
सीता जी के वनवास का एक पहलु ये भी है कि पुरादों के अनुसार श्री राम भगवन विष्णु का अवतार थे और ऋषि अगत्स्य ने एक बार विष्णु जी को श्राप दिया था की उन्हें अपने जीवन का लम्बा समय अपनी अर्धांगिनी के बिना बिताना पड़ेगा शायद विधि का विधान भी सीता जी के वनवास का एक कारन हो सकता है.
इस सम्बन्ध में एक वाकया और भी कहा जा सकता है कि एक बार हनुमान जी ने नारद जी के भगवन राम के नाम कि महानता को साबित करने के लिए उकसाने पर विश्वामित्र का सम्मान नहीं किया था.जिसपर उन्होंने श्री राम से उन्हें दण्डित करने को कहा था.हनुमान के अपने प्रिय होने के बावजूद श्री राम ने उन्हें दण्डित करने के लिए उन पर तीर चलाये पर हनुमान के श्री राम का नाम जपने के कारण वो उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए. ये था श्री राम कि निष्पक्ष न्याय और ये थी श्री राम के नाम कि महिमा.
आशा करता हूँ कि सभी कि शंकाएं दूर हो पाई होंगी.अगर कोई गलित हुई हो तो माफ़ करें और अपने सुझाव दें.
गाँधी जी के सम्बन्ध में भी यहाँ सिर्फ शंका को दूर करने के लिए जानकारी मांगी गयी है उनकी महानता को नकारा नहीं गया है.परन्तु अभी तक ब्लॉग में गाँधी जी के समर्थन में कही गयी बातें उनके विरोध में कही बातों को झुठला नहीं पायी हैं.



Tags:                     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

9 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shailesh001 के द्वारा
November 19, 2012

भारी समझ के स्वामी हैं आप. बहुत प्रशंसनीय प्रयास.  स्त्री किसी व्यक्ति के निजी जीवन का अंग है.. एक राजा, विशेषकर पुरातन काल के राजा जो अत्यंत शक्तिशाली एवं निरंकुश होते थे, यह संदेश उनकी मर्यादा सम्पन्नता हेतु था,कि राजकाज में निज भी निष्कलंक होना चाहिए.. राजा को निज मोह व व्यसन के प्रति संयमशील होना चाहिए… लंपटो और वास्तव में गृहस्थों को राज नहीं मिलना चाहिए..मिले तो केवल धर्मनिष्ठों को. पर, आज तो मूर्खों, स्त्रीगामी लंपटों का बोलबाला है. कोइ कुछ भी बक सकता है . लंपटता तो आज धर्म है… 

nishamittal के द्वारा
April 19, 2012

प्रतीक रा जी,सर्वप्रथम तो आप बधाई के पात्र हैं कि आप ने तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराई है,रामचरितमानस और रामायण जैसे ग्रंथों का युवा पीढी के होने पर भी आपकी इतनी रूचि प्रशंसनीय है,सूर्या को दीपक कौन दिखा सकता है.

    prateekraj के द्वारा
    April 19, 2012

    आपके जैसे अनुभवी व्यक्ति का मेरे लेख पर समय देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.मैंने तो बस श्री राम के चरित्र से जुडी कुछ शंकाओं को दूर करने की कोशिश की है.आशा है लोग संतुष्ट होंगे. धन्यवाद

rahulpriyadarshi के द्वारा
April 19, 2012

बहुत सुन्दर आलेख,वास्तव में श्रीराम नाम की महिमा इतनी बलवती है की खुद श्रीराम का भी वश राम नाम के आगे नहीं चलता.श्रीराम ने प्रजा-हित को अपने निजी-हितों से ऊपर रखा,इस कारण राम-राज्य एक आदर्श शासन व्यवस्था बन पाया,जहां तक बात गाँधी जी की है,वो भी इंसान थे,और गलत लोगों के प्रभाव में भी कभी आ जाते थे,किन्तु उन्होंने देश की जनता के लिए जितना बड़ा योगदान दिया है,उसके सामने उनकी थोड़ी सी कमियों को भूल जाना ही बेहतर होगा.

    prateekraj के द्वारा
    April 19, 2012

    राहुल जी, समर्थन के लिए धन्यवाद और गाँधी जी के बारे में जो विवाद चल रहा है वो उनकी राष्ट्रपिता के उपनाम और भगत सिंह के प्रकरण को लेकर है.वो एक महान नायक थे इस बात से मेरे ख्याल से सभी सहमत होंगे.

dineshaastik के द्वारा
April 19, 2012

प्रतीक  जी हम  किसी विषय या व्यक्ति से संबंध  में न्याय  संगत  विवेचन  तभी कर सकते हैं। जब हम   लिखते समय  बुद्धि से यह   विचार  निकाल  दें कि वह  व्यक्ति हमारा इष्टदेव, आदर्श, मित्र, निकट संबंधी, पूज्य या इन सबके विपरीत  है। चाहे यह  विवेचन  मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  के संबंध  में हो या तथाकथित  अहिंसा गाँधी जी के बारे में।    राम  चन्द्र जी के बारे में जितनी कहानियाँ हैं, उनमें अधिकांश मिथक  हैं। तुलसी और वाल्मीक  जी की रामायण  में कई  विरोधा- भास  हैं। जैसे वाल्मीक  जी सीता जी के स्तन  में कौऐ द्वारा चोंच मारने का वृतांत  लिखते हैं। जबकि तुलसी दास  पैरों में। और भी  कई रामायण  हैं जिनमें अनेकों विरोधाभास  भरे पड़ें हैं।  इग्लैण्ड  में  एक  राजा ने एक  स्त्री के प्रेम  में राजा का पद  त्याग दिया था। उनका कहना था कि व्यक्ति राजा बनने के लिये नहीं, अपितु प्रेम  करने के लिये संसार  में आया है। क्या राम  पत्नि धर्म  का पालन  करने के लिये राज्य  का त्याग  नहीं कर सकते है? उत्तर नहीं में मिलेगा, क्योंकि फिर वह मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  नहीं वन  पाते और अन्य राजाओं की तरह इतिहास के पन्नों में विलुप्त  हो जाते।  सीता जी को रावण  के महल  में रहने की सजा(जिसमें उनका दोष नहीं था) शंका के कारण  अग्नि परीक्षा के रूप में देना पड़ी। क्या यही दोष राम पर नहीं लगता है। क्योंकि वह भी तो बिना पत्नि के अकेले जंगल  में रहे थे। फिर वह सजा के हकदार क्यों नहीं? गर्भवती पत्नि के लिये क्या उन्हें राज्य का परित्याग  नहीं कर देना चाहिये था। क्योंकि वह भगवान हैं और हम  उनके बारे में ऐसा नहीं सोच  सकते, बस  कहानी खतम। महात्मा बुद्ध  ने  एक  बार  अपने शिष्यों से कहा था कि तुम  किसी बात  को केवल  इसलिये स्वीकार नहीं करना कि वह  गौतम  बुद्ध  ने कहीं हैं, अपितु मनन  चिन्तन  करना। यदि तुन्हे लगे कि यह  उचित  है तो मानना, अन्यथा नहीं। मुझे लगता है कि हमें भी यही सिद्धांत  सभी के साथ  अपनाना चाहिये। यदि मैं गलत हूँ तो कृपया मेरा मार्गदर्शन  करें।

    prateekraj के द्वारा
    April 19, 2012

    दिनेश जी, अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद. इस लेख में मैंने श्री राम को कहीं भी भगवन नहीं कहा है (सिर्फ उन पर किये गए सवाल में).स्पष्ट है की जो विवेचना की गयी है वो एक राजा की है. अगर इंग्लैंड के राजा की बात करें तो मैं कहूँगा की उसने राजधरम का पालन नहीं किया और वो राजा बनाने के योग्य नहीं था.मैं मानता हु की सभी को प्रेम करना चाहिए पर प्रेम के बहुत से रूप हैं और एक राजा को सबसे ज्यादा प्रेम अपनी प्रजा से होना चाहिए.जो कि श्री राम ने किया था. महान लोगों ने कहा है कि जीवन में हमेशा एक सरल रास्ता होता है और एक कठिन और जो उस कठिन रस्ते पर चलता है वही महान कहलाता है.श्री राम भी राजधरम छोड़कर सीता जी के साथ अयोध्या को छोड़ सकते थे पर ये उनके राज्य और प्रजा के साथ धोखा होता कि उनके राजा ने कठिन परीक्षा के समय उनका साथ छोड़ दिया.कहने को राज्य करने के लिए और भी लोग थे पर स्वयं भारत भी श्री राम के रहते अयोध्या पर राज्य करने से इनकार कर चुके थे. सीता जी को रावन हर कर ले गया था जहाँ वो उस पूर्व-महाज्ञानी कि क़ैद में अकेली थी और श्री राम जंगल में कभी अकेले नहीं थे उनके साथ हमेशा लक्ष्मण और बाद में पूरी वानर सेना थी तो ऐसे में उन पर सवाल करना कि उनके चरित्र पर दाग हो सकता है,मेरे अनुसार गलत होगा.और सीता जी कि अग्नीपरिक्षा श्री राम जी ने अपना शक दूर करने के लिए नहीं बल्कि जनता के लिए करायी थी.यहाँ भी उन्होंने अपनी पत्नी होने के बावजूद वही किया जो एक राजा को करना चाहिए था कि वो अपनी प्रिय के सम्बन्ध में भी कमजोर न पड़े. मेरा मानना है की श्री राम को हमें एक भगवान के तौर पर नहीं बल्कि एक आदर्श राजा के तौर पर पूजना चाहिए. किसी भी विषय पर बिना विवेचना किये उसका अनुसरण करने को मैं भी सही नहीं मानता.और श्री राम के विषय में भी ये बात लागू होती है और शायद इसीलिए सारे शास्त्रों और साहित्य में उनके जीवन की एक भी बात को न छिपाते हुए वर्णन किया गया है जिससे कि लोग उस पर अपना विचार बनाते हुए एक आदर्श जीवन व्यतीत करें. क्या श्री राम सिर्फ एक आदर्श राजा थे और एक अच्छे पति नहीं? इसके जवाब में मैं कहना चाहूँगा कि प्यार करने का मतलब सिर्फ साथ रहना ही नहीं होता.दूर रहने पर भी सिर्फ उसी के बारे में सोचना,उसे कभी भी न भूलना भी प्यार की ही एक निशानी है.और अगर श्री राम सीता जी से प्यार न करते तो फिर उन्होंने उनके जाने के बाद दूसरा विवाह कर लिया होता पर उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि यज्ञ में भी उन्होंने सीता जी की ही मूर्ति को अपने साथ स्थान दिया था.और सीता जी भी अयोध्या से निष्काषित होने के बावजूद लव-कुश का श्री राम के विरुद्ध बोलने का समर्थन नहीं करती थी. सीता जी से इतना प्रेम करने के बावजूद वो सिर्फ एक पति नहीं एक राजा भी थे और इसी की सजा उन दोनों को भुगतनी पड़ी थी.और हमें भी इससे ये सीखना चाहिए की जब आपको कोई जिम्मेदारी मिलती है तो आपको उसे निभाने के लिए बहुत से त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए या फिर आसान रास्ता चुनकर एक गुमनामी का जीवन व्यतीत कर सकते हैं. आपने इस चर्चा में इंग्लैंड के राजा का नाम लिया था तो मैं कहना चाहूँगा की अंग्रेजी की एक फिल्म “spiderman” में कहा भी गया है कि “with great power comes great responsibility”

prateekraj के द्वारा
April 19, 2012

this comment is only to check whether or not this post has any problem with posting comments here


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran