Indian Youth

About Anything & Everything

8 Posts

39 comments

prateekraj


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

प्रशासन कि मजबूरी-महिलाओ की जिम्मेदारी ?

Posted On: 26 Mar, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

बॉलीवुड- भारत की शान?

Posted On: 23 Mar, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी में

0 Comment

उक्रेनियन लडकियों का कृत्य कितना सही?

Posted On: 18 Feb, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others न्यूज़ बर्थ में

6 Comments

Hello world!

Posted On: 23 Jan, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

0 Comment

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दिनेश जी, अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद. इस लेख में मैंने श्री राम को कहीं भी भगवन नहीं कहा है (सिर्फ उन पर किये गए सवाल में).स्पष्ट है की जो विवेचना की गयी है वो एक राजा की है. अगर इंग्लैंड के राजा की बात करें तो मैं कहूँगा की उसने राजधरम का पालन नहीं किया और वो राजा बनाने के योग्य नहीं था.मैं मानता हु की सभी को प्रेम करना चाहिए पर प्रेम के बहुत से रूप हैं और एक राजा को सबसे ज्यादा प्रेम अपनी प्रजा से होना चाहिए.जो कि श्री राम ने किया था. महान लोगों ने कहा है कि जीवन में हमेशा एक सरल रास्ता होता है और एक कठिन और जो उस कठिन रस्ते पर चलता है वही महान कहलाता है.श्री राम भी राजधरम छोड़कर सीता जी के साथ अयोध्या को छोड़ सकते थे पर ये उनके राज्य और प्रजा के साथ धोखा होता कि उनके राजा ने कठिन परीक्षा के समय उनका साथ छोड़ दिया.कहने को राज्य करने के लिए और भी लोग थे पर स्वयं भारत भी श्री राम के रहते अयोध्या पर राज्य करने से इनकार कर चुके थे. सीता जी को रावन हर कर ले गया था जहाँ वो उस पूर्व-महाज्ञानी कि क़ैद में अकेली थी और श्री राम जंगल में कभी अकेले नहीं थे उनके साथ हमेशा लक्ष्मण और बाद में पूरी वानर सेना थी तो ऐसे में उन पर सवाल करना कि उनके चरित्र पर दाग हो सकता है,मेरे अनुसार गलत होगा.और सीता जी कि अग्नीपरिक्षा श्री राम जी ने अपना शक दूर करने के लिए नहीं बल्कि जनता के लिए करायी थी.यहाँ भी उन्होंने अपनी पत्नी होने के बावजूद वही किया जो एक राजा को करना चाहिए था कि वो अपनी प्रिय के सम्बन्ध में भी कमजोर न पड़े. मेरा मानना है की श्री राम को हमें एक भगवान के तौर पर नहीं बल्कि एक आदर्श राजा के तौर पर पूजना चाहिए. किसी भी विषय पर बिना विवेचना किये उसका अनुसरण करने को मैं भी सही नहीं मानता.और श्री राम के विषय में भी ये बात लागू होती है और शायद इसीलिए सारे शास्त्रों और साहित्य में उनके जीवन की एक भी बात को न छिपाते हुए वर्णन किया गया है जिससे कि लोग उस पर अपना विचार बनाते हुए एक आदर्श जीवन व्यतीत करें. क्या श्री राम सिर्फ एक आदर्श राजा थे और एक अच्छे पति नहीं? इसके जवाब में मैं कहना चाहूँगा कि प्यार करने का मतलब सिर्फ साथ रहना ही नहीं होता.दूर रहने पर भी सिर्फ उसी के बारे में सोचना,उसे कभी भी न भूलना भी प्यार की ही एक निशानी है.और अगर श्री राम सीता जी से प्यार न करते तो फिर उन्होंने उनके जाने के बाद दूसरा विवाह कर लिया होता पर उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि यज्ञ में भी उन्होंने सीता जी की ही मूर्ति को अपने साथ स्थान दिया था.और सीता जी भी अयोध्या से निष्काषित होने के बावजूद लव-कुश का श्री राम के विरुद्ध बोलने का समर्थन नहीं करती थी. सीता जी से इतना प्रेम करने के बावजूद वो सिर्फ एक पति नहीं एक राजा भी थे और इसी की सजा उन दोनों को भुगतनी पड़ी थी.और हमें भी इससे ये सीखना चाहिए की जब आपको कोई जिम्मेदारी मिलती है तो आपको उसे निभाने के लिए बहुत से त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए या फिर आसान रास्ता चुनकर एक गुमनामी का जीवन व्यतीत कर सकते हैं. आपने इस चर्चा में इंग्लैंड के राजा का नाम लिया था तो मैं कहना चाहूँगा की अंग्रेजी की एक फिल्म "spiderman" में कहा भी गया है कि "with great power comes great responsibility"

के द्वारा: prateekraj prateekraj

प्रतीक  जी हम  किसी विषय या व्यक्ति से संबंध  में न्याय  संगत  विवेचन  तभी कर सकते हैं। जब हम   लिखते समय  बुद्धि से यह   विचार  निकाल  दें कि वह  व्यक्ति हमारा इष्टदेव, आदर्श, मित्र, निकट संबंधी, पूज्य या इन सबके विपरीत  है। चाहे यह  विवेचन  मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  के संबंध  में हो या तथाकथित  अहिंसा गाँधी जी के बारे में।    राम  चन्द्र जी के बारे में जितनी कहानियाँ हैं, उनमें अधिकांश मिथक  हैं। तुलसी और वाल्मीक  जी की रामायण  में कई  विरोधा- भास  हैं। जैसे वाल्मीक  जी सीता जी के स्तन  में कौऐ द्वारा चोंच मारने का वृतांत  लिखते हैं। जबकि तुलसी दास  पैरों में। और भी  कई रामायण  हैं जिनमें अनेकों विरोधाभास  भरे पड़ें हैं।  इग्लैण्ड  में  एक  राजा ने एक  स्त्री के प्रेम  में राजा का पद  त्याग दिया था। उनका कहना था कि व्यक्ति राजा बनने के लिये नहीं, अपितु प्रेम  करने के लिये संसार  में आया है। क्या राम  पत्नि धर्म  का पालन  करने के लिये राज्य  का त्याग  नहीं कर सकते है? उत्तर नहीं में मिलेगा, क्योंकि फिर वह मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  नहीं वन  पाते और अन्य राजाओं की तरह इतिहास के पन्नों में विलुप्त  हो जाते।  सीता जी को रावण  के महल  में रहने की सजा(जिसमें उनका दोष नहीं था) शंका के कारण  अग्नि परीक्षा के रूप में देना पड़ी। क्या यही दोष राम पर नहीं लगता है। क्योंकि वह भी तो बिना पत्नि के अकेले जंगल  में रहे थे। फिर वह सजा के हकदार क्यों नहीं? गर्भवती पत्नि के लिये क्या उन्हें राज्य का परित्याग  नहीं कर देना चाहिये था। क्योंकि वह भगवान हैं और हम  उनके बारे में ऐसा नहीं सोच  सकते, बस  कहानी खतम। महात्मा बुद्ध  ने  एक  बार  अपने शिष्यों से कहा था कि तुम  किसी बात  को केवल  इसलिये स्वीकार नहीं करना कि वह  गौतम  बुद्ध  ने कहीं हैं, अपितु मनन  चिन्तन  करना। यदि तुन्हे लगे कि यह  उचित  है तो मानना, अन्यथा नहीं। मुझे लगता है कि हमें भी यही सिद्धांत  सभी के साथ  अपनाना चाहिये। यदि मैं गलत हूँ तो कृपया मेरा मार्गदर्शन  करें।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

नमस्ते प्रतीक भाई (आपने प्रभु श्रीराम के बारे में जो अपना लेख लिखा है - "मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की वकालत" वहां कमेंट्स पोस्ट नहीं हो पा रहे हैं इसलिए उसपर अपने विचार यहाँ दे रहा हूँ) बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ आपने हमारे आराध्य श्रीराम के बारे में अपनी बातें कहीं. युवा आप भी हैं युवा मैं भी हूँ. आपका अभिनन्दन करता हूँ. इस लेख के द्वारा आपने उन अधार्मिक लोगों को सही प्रत्युत्तर दिया जो हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी नहीं रखते हुए अनर्गल प्रलाप करते हैं और लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करते हैं. आजकल एक फैशन हो गया है की अगर इंसानों की कमियां छुपानी हों तो उनकी तुलना भगवान से कर दो और कहो की - अरे देखो भगवान ने भी तो यही किया था फिर अगर हम ऐसा करें तो क्या गलत है? आजकल मनुष्य धर्म से विमुख होता जा रहा है ये सब उसी का परिणाम है. जो लोग नैतिकता भूल चुके हैं उन्हें धार्मिक विषयों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं. दरअसल ऐसी बातें अल्पबुद्धि लोगों के द्वारा अतार्किक रूप से की जाती हैं. ऐसी बातों का जवाब देकर उन्हें मूल्य/महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए.

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

के द्वारा: alizaid alizaid

के द्वारा: prateekraj prateekraj

के द्वारा: prateekraj prateekraj

के द्वारा: prateekraj prateekraj

के द्वारा: prateekraj prateekraj

के द्वारा: prateekraj prateekraj




latest from jagran